काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) में छात्रों के लिए 'नेशनल सिविल सर्विसेज डे' के अवसर पर एक खास चर्चा का आयोजन किया गया। विश्वविद्यालय की सिविल सेवा सोसाइटी 'अभ्युदय' और दृष्टि आईएएस (Drishti IAS) के साझा प्रयास से आयोजित इस कार्यक्रम - ‘आरंभ 3.0’ का मकसद छात्रों को किताबी ज्ञान से आगे बढ़कर परीक्षा की व्यावहारिक चुनौतियों के लिए तैयार करना था।
कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के तौर पर पहुंचे दृष्टि आईएएस के फैकल्टी अख्तर मलिक ने छात्रों को यूपीएससी परीक्षा का डर दूर करने के टिप्स दिए। उन्होंने साफ तौर पर कहा कि यूपीएससी केवल आपकी याददाश्त नहीं, बल्कि आपके सोचने और उसे कागज पर उतारने के तरीके को परखता है। अख्तर मलिक ने छात्रों को समझाया कि कैसे उत्तर-लेखन (Answer Writing) में शब्दों का सही चुनाव और विचारों का तालमेल एक साधारण छात्र को 'अचीवर' बना सकता है। उन्होंने जोर दिया कि रटने के बजाय कॉन्सेप्ट्स को समझना ही सफलता की असली चाबी है।
अधिकारियों और एक्सपर्ट्स ने साझा किए कड़वे सच
इस शैक्षणिक संवाद में केवल किताबी बातें नहीं हुईं, बल्कि विशेषज्ञों ने परीक्षा की जमीनी हकीकत भी सामने रखी:
यूपीएससी के पूर्व पैनलिस्ट डॉ. आर.पी. पाठक ने इंटरव्यू बोर्ड की उम्मीदों पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि इंटरव्यू में आपका ज्ञान पहले ही परखा जा चुका होता है, वहां बोर्ड यह देखता है कि आप दबाव में कैसे निर्णय लेते हैं और आपकी सोच कितनी संतुलित है।
आईपीएस चिराग जैन (2020 बैच) ने अपनी तैयारी के दिनों और पुलिस सेवा की चुनौतियों को साझा किया। उन्होंने छात्रों को बताया कि प्रशासनिक सेवा में आने के बाद धैर्य और मानसिक मजबूती सबसे ज्यादा काम आती है।
सूरज तिवारी (AIR 917) ने अपनी सफलता की कहानी से छात्रों को प्रेरित किया और बताया कि लंबी तैयारी के दौरान खुद का मूल्यांकन करना क्यों जरूरी है।
सवालों की बौछार और एक्सपर्ट्स के जवाब
BHU के छात्रों ने इस सत्र में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया और विशेषज्ञों से सीधे सवाल पूछे। छात्रों ने कोचिंग के चुनाव, ऑप्शनल सब्जेक्ट की उलझन और तैयारी के दौरान होने वाले मानसिक तनाव जैसे मुद्दों पर खुलकर बात की। विशेषज्ञों ने भी बिना किसी 'मोटिवेशनल शोर' के बहुत ही सादगी और ईमानदारी से छात्रों की शंकाओं का समाधान किया।
इस तरह के आयोजनों से साफ है कि जब दृष्टि आईएएस जैसे अनुभवी संस्थान और बीएचयू जैसे प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय हाथ मिलाते हैं, तो इसका सीधा फायदा उन हजारों छात्रों को होता है जो सीमित संसाधनों के बीच बड़े सपने देख रहे हैं। यह कार्यक्रम न केवल एक संवाद था, बल्कि वाराणसी के युवाओं के लिए सिविल सेवा की राह को थोड़ा और आसान बनाने की एक गंभीर कोशिश थी।

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